“छलनी से चाँद देखने” की परंपरा भारत में करवा चौथ व्रत का सबसे प्रसिद्ध दृश्य बन चुकी है — लेकिन इसका उल्लेख किसी भी प्राचीन ग्रंथ, पुराण, या शास्त्र में नहीं मिलता।
नीचे इसका पूरा सत्य और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विश्लेषण दिया गया है 👇
🔹 1. प्राचीन ग्रंथों में क्या उल्लेख है?
- स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, भविष्य पुराण, और व्रतराज आदि में करक चौथ (करवा चौथ) व्रत का उल्लेख है,
लेकिन इनमें “छलनी से चंद्र दर्शन” या “पति का मुख छलनी से देखने” की कोई भी चर्चा नहीं है। - पुराणों में व्रत का विधान बस इतना बताया गया है कि
👉 “संध्या के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर, फिर पति का दर्शन करें और जल ग्रहण करें।”
यानी यह सीधा और सरल विधान है — छलनी, दीपक या परछाई देखने जैसी कोई बात नहीं।
🔹 2. तो छलनी से चाँद देखने की प्रथा कहाँ से आई?
यह परंपरा लोककथा और लोकश्रद्धा से उत्पन्न हुई मानी जाती है।
संभावित रूप से इसका आरंभ मध्यकालीन उत्तर भारत (मुख्यतः पंजाब और उत्तर प्रदेश क्षेत्र) में हुआ,
जहाँ स्त्रियों ने व्रत में एक भावनात्मक और सौंदर्यपूर्ण अनुष्ठान जोड़ दिया।
लोककथाओं में “करवा चौथ की कथा” — जिसमें रानी वीरवती अपनी छलनी से चंद्रमा देखती है —
उसी कथा के प्रभाव से यह रिवाज प्रचलित हुआ।
परंतु यह कथा किसी शास्त्रीय स्रोत में नहीं मिलती, यह एक लोककथा है, जो मौखिक रूप से पीढ़ियों में फैली।
🔹 3. आधुनिक समय में इसका प्रचार
- 20वीं सदी के उत्तरार्ध में फिल्मों और टीवी धारावाहिकों (जैसे “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे”) ने छलनी से चाँद देखने की परंपरा को “रोमांटिक प्रतीक” बना दिया।
- इस कारण यह संस्कृति का भावनात्मक हिस्सा बन गया, भले ही शास्त्र में इसका उल्लेख न हो।
🔹 4. शास्त्रीय दृष्टि से सही तरीका
पुराणों के अनुसार करक चौथ व्रत विधि:
- दिनभर निर्जला व्रत रखकर संध्या के समय चंद्र दर्शन करें।
- चंद्रदेव को दूध, जल, और अर्घ्य अर्पित करें।
- उनके मंत्रों का जप करें —
“ॐ चंद्राय नमः” या “ॐ सोमाय नमः”। - तत्पश्चात पति का दर्शन करें और व्रत का पारण करें।
यानी यह व्रत श्रद्धा, संयम और सौभाग्य की भावना से किया जाता है, न कि छलनी से चाँद देखने से।
🔹 5. निष्कर्ष
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| 📜 ग्रंथों में उल्लेख | नहीं, किसी पुराण या वेद में छलनी का उल्लेख नहीं |
| 🌕 मूल विधान | चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति का दर्शन |
| 🪶 छलनी परंपरा | लोककथा व भावनात्मक प्रतीक से उत्पन्न |
| 💡 संदेश | पति-पत्नी के पारस्परिक स्नेह और दीर्घायु की प्रार्थना |
🔸 स्रोत:
- स्कंद पुराण, व्रत खंड
- पद्म पुराण, उत्तर खंड
- भविष्य पुराण, व्रत पर्व
- लोककथा “वीरवती की कथा” (लोक परंपरा, उत्तर भारत)





