परिचय
हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष में आने वाली इंदिरा एकादशी का व्रत विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह व्रत भगवान विष्णु की उपासना और पितृ तृप्ति दोनों के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। 2025 में यह व्रत बुधवार, 17 सितंबर को रखा जाएगा।
तिथि और शुभ मुहूर्त
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 16 सितंबर 2025, रात 12:21 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 17 सितंबर 2025, रात 11:39 बजे
- व्रत रखने की तिथि (उदया तिथि अनुसार): 17 सितंबर 2025, बुधवार
- पारण (व्रत खोलने का समय): 18 सितंबर 2025, सुबह 05:33 बजे से 07:04 बजे तक
इंदिरा एकादशी का महत्व
- पितृ शांति व मोक्ष: पितृ पक्ष में आने के कारण यह व्रत पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए अत्यंत फलदायी है।
- पापों का नाश: विधिपूर्वक व्रत और पूजन से सभी पापों का क्षय होता है।
- परिवार में सुख-समृद्धि: इस व्रत से घर में शांति और धन-वैभव की वृद्धि होती है।
पूजा-विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पीले पुष्प, तुलसी दल, फल एवं दीप-धूप से पूजन करें।
- यदि संभव हो तो शिवलिंग पर 21 बेलपत्र चढ़ाएं और शिव मंत्रों का जाप करें।
- पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और पितृ तर्पण का विशेष महत्व है।
- दिनभर उपवास रखें, शाम को भगवान विष्णु का कीर्तन करें और रात्रि जागरण करें।
व्रत पारण
द्वादशी तिथि पर, 18 सितंबर की सुबह शुभ समय (05:33–07:04 बजे) में व्रत पारण करें।
व्रत कथा एवं विशेष योग
शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत को करने से अनजाने पाप नष्ट होते हैं। 2025 में इंदिरा एकादशी पर पुनर्वसु नक्षत्र और विशेष योग बन रहा है, जिससे व्रत का पुण्यफल कई गुना बढ़ जाता है।
शास्त्रीय निर्णय और श्राद्ध नियम
- अन्न निषेध: एकादशी पर चावल, गेहूं, उड़द जैसे अन्न का सेवन और दान वर्जित है।
- फलाहार का महत्व: व्रती फल, दूध, मखाना, शाक, मिठाई आदि का सेवन कर सकते हैं।
- पिंडदान: यदि श्राद्ध आवश्यक हो, तो मखाना-खीर या सात्विक फलाहार से ही करें।
- ब्राह्मण भोजन: ब्राह्मणों को भी फलाहार या व्रतीय भोजन ही कराना श्रेष्ठ माना गया है।
- वैकल्पिक दिन: यदि संभव हो तो श्राद्ध द्वादशी (अगले दिन) पर करें, ताकि अन्न निषेध का पालन हो सके।
निष्कर्ष
अश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी 2025 का व्रत पितृ पक्ष के दौरान पड़ने के कारण विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान विष्णु की उपासना, उपवास और पितृ तर्पण से साधक को पितृ तृप्ति, पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रीय मत के अनुसार, इस दिन अन्न त्याग और फलाहार का पालन कर व्रत को पूर्ण करना अत्यंत पुण्यकारी है।





